+ मृतक के पास मयूरपिच्छिकादि उपकरण स्थापने में गुण दिखाते हैं - -
जो वि विरधिय दंसणमंते कालं करित्तु होज्ज सुरो ।
सो वि विवुज्झदि दठ्ठूण सदेहं सोवधिं सज्जो॥1994॥
जो सम्यक्त्व विराधक मरकर सुर होकर निज शव देखे ।
पीछी लखकर ज्ञान करे कि हम गत भव में साधु थे॥1994॥
अन्वयार्थ : कदाचित् कोई क्षपक संक्लेश परिणामों से अनन्तकाल में सम्यग्दर्शन की विराधना करके व्यंतर-असुरादि देवों में उत्पन्न हुए हों, वे उस स्थान में आयें तो उपने शरीर को पीछी सहित देखते हैं तो फिर से ज्ञान उत्पन्न होने से सम्यक्त्व को ग्रहण/प्राप्त कर लेता है कि मैं पूर्व में संयमी था, अब मैं कैसे विकारी/अज्ञानी-असंयमी हो गया हूँ । इस तरह धर्म में दृढ हो जाते हैं, इसलिए मृतक मुनि के निकट उपकरण स्थापन करने में गुण कहे हैं और सभी में आराधना प्रसिद्ध हो, जिसका पार नहीं पूर्ण होने पर महान प्रभावना होती है ।

  सदासुखदासजी