+ इस आराधना के धारक के मरण से निमित्त विचारिए तो संघ का भविष्य भी कितना (कैसा) है - यह निश्चय हो जाता है, यह कहते हैं - -
णत्ता भाए रिक्खे जदि कालगदो सिवं तु सव्वेसिं ।
एको दु समे खेत्ते दिवढ्ढखेत्ते मरंति दुवे॥1995॥
जघन नक्षत्र में क्षपक-मरण हो तो होता संघ का कल्याण ।
मध्यम में, मृत एक साधु अरु उत्तम में दो मृत्यु वरें॥1995॥

  सदासुखदासजी