जं वा दिसमुवणीदं सरीरयं खगचदुप्पदगणेहिं ।
खेमं सिवं सुभिक्खं विहरिज्जो तं दिसं संघो॥2005॥
अथवा पशु-पक्षी जिस दिशि में उस शरीर को ले जायें ।
क्षेम सुभिक्ष जानकर संघ भी उसी दिशा में गमन करें॥2005॥
अन्वयार्थ : पक्षी तथा चतुष्पादकों (पशुओं) का समूह क्षपक के शरीर का खंड जिस दिशा में ले गये हों, उस दिशा में क्षेत्र, शिव, सुभिक्ष जानकर उस दिशा में संघ विहार करें ।

  सदासुखदासजी