पं-सदासुखदासजी
जदि तस्स उत्तमंगं दिस्सदि दंता च उवरिगिरिसिहरे ।
कम्ममलबिप्पमुक्को सिद्धिं पत्तोत्ति णादव्वो॥2006॥
उत्तम अंग-रु दाँत मृतक के गिरि-शिखर पर दिखते हों ।
तो जानो वह क्षपक सुनिश्चित प्राप्त हुआ है सिद्धि को॥2006॥
सदासुखदासजी