
वेमाणिओ थलगदो समम्मि जो दिसि य वाणबिंतरओ ।
गड्डाए भवणवासी एस गदी से समासणे॥2007॥
यदि मस्तक हो उन्नत भू पर सम-भू एवं गड्ढे में ।
क्रमशः वैमानिक ज्योतिष अरु व्यन्तर देव हुआ जानो॥2007॥
अन्वयार्थ : क्षपक की गति भी संक्षेप में ऐसी जानी जाती है कि क्षपक का मस्तक या दंत पर्वत के शिखर ऊपर दिखें तो ऐसा जानना कि कर्ममलरहित सिद्ध हुए हैं और मस्तक स्थलगत उन्नत भूमि में पयडे दिखें तो ऐसा जानना कि वैमानिक देव हुए हैं और समभूमि में दिखें तो ज्योतिष्क देवों में या व्यंतर देवों में गये हैं और गह्ने में दिखें तो भवनवासियों में गये हैं । इसप्रकार निमित्त द्वारा स्थूलपने से गति जानी जाती है ।
सदासुखदासजी