
ते वि य महाणुभावा धण्णा जेहिं च तस्स खवयस्स ।
सव्वादरसत्तीए उवविहिदाराधणा सयला॥2011॥
अहो धन्य वे निर्यापक आचार्य महानुभाव भगवन्त ।
जिनने पूर्ण शक्ति आदर से आराधन कराई सम्पन्न॥2011॥
अन्वयार्थ : वे महानुभाव निर्यापक धन्य हैं, जिन्होंने सर्व आदरपूर्वक सम्पूर्ण शक्ति द्वारा उन क्षपक की सम्पूर्ण आराधना कराई ।
सदासुखदासजी