जो उवविधेदि सव्वादरेण आराधणं कु अण्णस्स ।
संपज्जदि णिव्विग्घा सयला आराधणा तस्स॥2012॥
अहो अन्य की आराधना करायें पूरे आदर से ।
उनकी भी समस्त आराधन बिना विघ्न के होती पूर्ण॥2012॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष अन्य धर्मात्मा पुरुष की सर्व प्रकार से आदर सहित, शरीर की वैयावृत्त्य करके, धर्मोपदेश देकर, धर्म में दृढता कराके, आहार-पान-औषध-स्थान दान देकर, आराधना कराते हैं, उस पुरुष/साधु की सम्पूर्ण आराधना निर्विघ्नतापूर्वक परिपूर्ण होती है । अन्य धर्मात्मा पुरुष को आराधनामरण कराने में जो सहायी होते हैं, वे चारों आराधना की पूर्णता करके लोकाग्र स्थान में निवास करते हैं ।

  सदासुखदासजी