+ अब जो आराधना करने वाले के दर्शन करने जाते हैं, उनकी महिमा कहते हैं - -
ते वि कदत्था धण्णा य हुन्ति जे पावकम्ममलहरणे ।
ण्हायंति खवयतित्थे सव्वादर भत्ति संजुत्ता॥2013॥
पाप-मैल के प्रक्षालक हैं क्षपक तीर्थ में स्नान करें ।
पूर्ण विनय अरु भक्ति सहित जो उसको धन्य कृतार्थ कहें॥2013॥
अन्वयार्थ : वे पुरुष भी जगत में धन्य हैं, कृतार्थ हैं, जो पापकर्म रूप मैल को हरने वाले क्षपकरूप तीर्थ में सर्व आदर-भक्ति से संयुक्त स्नान करते हैं और जो भक्ति संयुक्त होकर क्षपक के दर्शन में प्रवर्तते हैं, वे धन्य हैं, कृतार्थ हैं ।

  सदासुखदासजी