+ अब क्षपक का तीर्थपना दिखाते हैं- -
गिरिणदियादिपदेसा तित्थाणि तवोधणेहिं जदि उसिदा ।
तित्थं कधं ण हुज्जो तवगुणरासी सयं खवउ॥2014॥
अहो तपोधन से स्पर्शित गिरि सरितादिक तीर्थ कहें ।
तो तपरूप गुणों की राशि क्षपक स्वयं क्यों तीर्थ नहीं॥2014॥
अन्वयार्थ : जो तपस्वी जन जिस पर्वत इत्यादि प्रदेशों/क्षेत्रों में विराजमान रहते हैं, वे पर्वत, नदी आदि जगत में तीर्थ मानकर सेवन-उनकी उपासना करते हैं तो तपगुण की राशि ऐसे क्षपक स्वयं तीर्थ कैसे नहीं होंगे?

  सदासुखदासजी