
पुव्वरिसीणं पडिमाओ वन्दमाणस्स होइ जदि पुण्णं ।
खवयस्स वंदओ किह पुण्णं विउलं ण पाविज्ज॥2015॥
यदि प्राचीन ऋषि-प्रतिमा को वन्दन से होता है पुण्य ।
करें वन्दना आराधक की क्यों न उन्हें हो पुण्य विपुल॥2015॥
अन्वयार्थ : पूर्व में जो ऋषि मुनि हुए, उनकी प्रतिमाओं को वंदन करने वाले पुरुष को पुण्य होता है तो साक्षात् क्षपक की वंदना करने वाले पुरुष को प्रचुर/उत्कृष्ट पुण्य कैसे प्राप्त नहीं होगा?
सदासुखदासजी