
जो ओलग्गदि आराधयं सदा तिव्वभत्तिसंजुत्तो ।
संपज्जदि णिव्विग्घा तस्स वि आराहणा सयला॥2016॥
तीव्र भक्ति से सेवा करते हैं जो क्षपक मुनीश्वर की ।
आराधना सफल होती है पूर्णतया उन भक्तों की॥2016॥
अन्वयार्थ : जो तीव्र भक्ति संयुक्त होकर आराधना के धारक की सदाकाल सेवा-उपासना करते हैं, उस पुरुष को निर्विघ्न आराधना प्राप्त होती है और उसकी आराधना सफल होती है । इति नामक ग्रन्थ में पंडित मरण के तीन भेदों में सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण का वर्णन चालीस अधिकारों में उन्नीस सौ गाथाओं में पूर्ण किया ।
सदासुखदासजी