
जावय बलविरियं से सो विहरदि ताव णिप्पडीयारो ।
पच्छा विहरदि पडिजग्गिज्जंतो तेण सगणेण॥2021॥
जब तक शक्ति हो तब तक न करायें परिचर्या संघ से ।
शक्ति-हीन हों तो परिचर्या करवाते हैं वे संघ से॥2021॥
अन्वयार्थ : जो मुनि रोग की पीडा से पीडित हो और परगणादि में विहार करने का जंघा में बल घट गया हो, परसंघ में जाने को असमर्थ हों, उन मुनिराज के लिए निरुद्धभक्तप्रत्याख्यान कहा है । जब तक बल-वीर्य देह में रहे, तब तक अन्य से इलाज/टहल/वैयावृत्त्य नहीं करावें । आहार के लिये जाने में, निहार करने में, विहार करने में, पर की सहायता नहीं चाहें और जब शरीर थक जाये, तब अपने संघ के मुनीश्वरों की सहायता से प्रवृत्ति करें ।
सदासुखदासजी