
इय सण्णिरुद्धमरणं भणियं अणिहारिमं अवीचारं ।
सो चेब जधाजेाग्गं पुव्वुत्तविधी हवदि तस्स॥2022॥
यह निरुद्ध मरणोत्सव है अनिहार और अविचार स्वरूप ।
इनके हैं अतिरिक्त सभी विधि पूर्व मरण के योग्य कही॥2022॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार जंघा में बल की हीनता से तथा शरीर रोग-व्याधि से पीडित होने पर अपने संघ में निरुद्ध हो गया - परगण में जाने के लिए समर्थ नहीं रहे; इसलिए इसे निरुद्ध कहते हैं और सविचार भक्तप्रत्याख्यान में जो विधि कही, उसके अभाव के कारण इसे अनिहारित कहते हैं । अनियतविहारादि विधिरूप आचरण के अभाव से अविचार कहते हैं । अपने संघ में ही आचार्य के समीप में अविचार/शुद्ध होकर के अपनी निंदा-गर्हा करते हुए जब तक स्वयं में शक्ति रहे, तब तक पर से प्रतीकार नहीं कराते हुए विहार करें, प्रवर्तन करें । जब समस्त चेष्टा हीन हो जायें, तब पर से अनुग्रह करते हुए विहार करें/संघ द्वारा उपकृत होकर उक्त क्रियायें करते हैं ।
सदासुखदासजी