खवयस्स चित्तसारं खित्तं कालं पडुच्च सजणं वा ।
अण्णम्मि य तारिसयम्मि कारणे अप्पगासं तु॥2024॥
क्षपक मनोबल क्षेत्र काल बुद्धि अथवा स्वजनादिक का ।
कर विचार आचार्य भक्त प्रत्याख्यान नहिं प्रकट करें॥2024॥
अन्वयार्थ : क्षपक की बुद्धि के बल को, क्षेत्र, काल को, स्वजनों को तथा और भी कारणों से प्रकाशित करने योग्य न हो तो समाधिमरण की प्रकटता नहीं होती है, इसलिए अप्रकाश कहते हैं । यदि क्षपक क्षुधादि परीषह सहने में असमर्थ हो, वसतिका एकांत में न हो या अज्ञानी धर्म में विघ्न करने वाले हों, वहाँ समाधिमरण तो कराते हैं; परंतु देश, काल, द्रव्य, भाव की योग्यता बिना प्रगट नहीं करते, यह अविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण का निरुद्ध नाम के भेद में अप्रकाश वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी