पं-सदासुखदासजी
जाव ण वाया खिप्पदि बलं च विरियं च जाव कायम्मि ।
तिव्वाए वेदणाए जाव य चित्तं ण विक्खर्त्त॥2026॥
जब तक बोली बन्द न हो या तन में शक्ति और हो बल ।
तीव्र वेदना के कारण भी जब तक चित्त न हो व्याकुल॥2026॥
सदासुखदासजी