
णच्चा संवट्टिज्जं तमाउगं सिग्घमेव तो भिक्खू ।
गणियादीणं सण्णिहिदाणं आलोचए सम्मं॥2027॥
आयु पूर्ण होती जानें तो जो हों निकटवर्ति आचार्य ।
उनके सम्मुख आलोचन कर मरण-समाधि करें स्वीकार॥2027॥
अन्वयार्थ : सर्प द्वारा, अग्नि द्वारा, व्याघ्र द्वारा, महिष द्वारा, गज/हाथी द्वारा तथा रीछ आदि पशुओं द्वारा, शत्रुओं द्वारा, चोरों द्वारा, म्लेच्छों द्वारा, मूर्च्छा से, विसूचिकादि द्वारा तत्काल शीघ्रता से आपत्ति आ जाये तो जब तक वाणी न थके, वचन बोलने की शक्ति नष्ट न हो, जब तक काय का बल-वीर्य नष्ट न हो तथा जब तक तीव्र वेदना के कारण अपना चित्त विक्षिप्त न हो, तब तक साधु अपनी आयु संकुचित/क्षीण होती जानकर शीघ्र ही अपने निकट कोई आचार्यादि हों, उनके समक्ष सम्यक् आलोचना करके और आराधना का शरण ग्रहण करके शरीर का त्याग करें, यह अविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण का निरुद्धतर नाम का दूसरा भेद है ।
सदासुखदासजी