
एवं णिरुद्धदरयं विदियं अणिहरिमं अवीचारं ।
सो चेव जधाजोग्गो पुव्वुत्तविधि हवदि तस्स॥2028॥
यह दूजा निरुद्धतर भक्त प्रत्याख्यान कहा अनिहार ।
पूर्व कथित प्रत्याख्यान विधि यथायोग्य करना स्वीकार॥2028॥
अन्वयार्थ : ऐसे विहार रहित अत्यंत निरोधरूप अविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण का निरुद्धतर नाम का दूसरा भेद कहा । इसमें भी जो पूर्व में भक्तप्रत्याख्यान में विधि कही गई है, वही यथायोग्य जाननी । यदि सिंह, व्याघ्र, अग्नि, जलादि के कारण अचानक शीघ्र ही मरण हो जाये, तब तो आचार्यादि से आलोचनादि भी नहीं हो सकती, उस समय जो निकटवर्ती साधु हैं, उनसे ही आलोचना करके शीघ्र मरण करे/देह का त्याग करें, उसके निरुद्धतर नामक मरण होता है । इस प्रकार चार गाथाओं में निरुद्धतर का वर्णन किया ।
सदासुखदासजी