
बालादिएहिं जइया अक्खित्ता होज्ज भिक्खुणो वाया ।
तइया परमणिरुद्धं भणिदं मरणं अवीचारं॥2029॥
यदि सर्पादिक डसें क्षपक को तो उसकी वाणी हो नष्ट ।
परम निरुद्ध नामक अविचार भक्त प्रत्याख्यान हो इष्ट॥2029॥
अन्वयार्थ : सर्प, व्याघ्र, सिंह, अग्नि, चोरादि द्वारा उपद्रव से यदि क्षपक की वाणी नष्ट हो जाय, बोलना बंद हो जाये, तब साधु के परमनिरुद्ध नाम का अविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण होता है ।
सदासुखदासजी