
आराधनणाविधी जो पुव्वं उववण्णिदो सवित्थारो ।
सो चेव जुज्जमाणो एत्थ विही होदि णादव्वो॥2031॥
पहले आराधन की विधि विस्तार पूर्वक कही गई ।
इस अवसर पर उसी विधि को यथायोग्य तुम अपनाओ॥2031॥
अन्वयार्थ : जो पूर्व में आराधना विधि विस्तारसहित वर्णन की गई है, वही विधि अवसर के योग्य यहाँ भी जानना योग्य है ।
सदासुखदासजी