
आराधणाए तत्थ दु कालस्स बहुत्तणं ण हु पमाणं ।
बहवो मुहुत्तमत्ता संसारमहण्णवं तिण्णा॥2033॥
आराधन में काल बहुलता का नहिं कोई प्रमाण कहा ।
बहुत मुनि बस एक मुहूर्त आराधन करके पार हुए॥2033॥
अन्वयार्थ : आराधना करने के लिये बहुत काल हो तो होती है, ऐसा कोई प्रमाण/नियम नहीं है । बहुत-से जीव अंतर्मुहूर्त मात्र में आराधना करके संसार-समुद्र को तिर गये हैं, क्योंकि क्षायिकसम्यक्त्व, क्षायिकज्ञान/केवलज्ञान, क्षायिकचारित्र/यथाख्यातचारित्र, तप/शुक्लध्यान - ये अन्तर्मुहूर्त में उत्पन्न हो जाते हैं और इन चार आराधनाओं को प्राप्त करने के बाद अन्तर्मुहूर्त में सिद्धि हो जाती है ।
सदासुखदासजी