
खणमेत्तेण अणादियमिच्छादिट्ठी वि वद्धणो राया ।
उसहस्स पादमूले संबुज्झिता गदो सिद्धिं॥2034॥
था अनादि का मिथ्यादृष्टि वर्धन राजा क्षण भर में ।
ऋषभदेव के पादमूल में बोध प्राप्त कर मुक्त हुआ॥2034॥
अन्वयार्थ : अनादि मिथ्यादृष्टि वर्द्धन नामक राजा वृषभदेव स्वामी के चरणों के निकट प्रबोध को प्राप्त होकर क्षणमात्र में सिद्धि को प्राप्त हुए ।
सदासुखदासजी