
जो भत्तपदिण्णाए उवक्कमो वण्णिदो सवित्थारो ।
सो चेव जधाजोग्गो उवक्कमो इंगिणीए वि॥2037॥
कही भक्त प्रत्याख्यान की विधि हमने करके विस्तार ।
वही विधि इंगनीमरण की अब जानो उसका विस्तार॥2037॥
अन्वयार्थ : जो भक्तप्रत्याख्यान का क्रम विस्तार सहित वर्णन किया, वही यथायोग्य इंगिनीमरण में भी आरम्भ से जानना ।
सदासुखदासजी