पं-सदासुखदासजी
पव्वज्जाए सुद्धो उवसंपज्जित्तु लिंगकप्पं च ।
पवयणमोगहित्ता विणयसमाधीए विहरित्ता॥2038॥
जो दीक्षा लेने लायक वह करे निर्ग्रन्थ लिंग स्वीकार ।
श्रुत अभ्यास करे अरु विनय समाधि में नित करे विहार॥2038॥
सदासुखदासजी