
अणुसट्ठिं दादूण य जावज्जीवाय विप्पओगच्छी ।
अम्भदिगजादहासो णीदि गणादो गुणसमग्गो॥2041॥
संघ को शिक्षा देकर यावज्जीव पृथक् विहारकामी ।
गुण विशिष्ट वह क्षपक कृतार्थ हुआ मुनिसंघ से करे गमन॥2041॥
अन्वयार्थ : इंगिनीमरण कैसा होता है? उसे कहते हैं - जो दीक्षाग्रहण करने के योग्य हो, शुद्ध हो, आचारांग के अनुकूल, योग्य वीतराग लिंग ग्रहण करके, जिनेन्द्र प्ररूपित आचारांगादि का अवगाहन करके, विनय में तथा समाधि के परिणामों की सावधानी पूर्वक प्रवर्तन करके, अपने संघ को रत्नत्रय में दृढता प्राप्त कराके, इंगिनीमरण की विधि के साधन के लिये परिणमन करके, परिणामों की विशुद्धतारूप श्रेणी चढकर, अपने आत्मा का शोधन करके; जो रत्नत्रय में अतीचार लगे हों, उनको शोधकर, जो आपके बाद नवीन आचार्य होंगे, उन्हें जनाकर/बतलाकर, चार प्रकार के संयमियों का बालवृद्ध सहित समस्त संघ से मन-वचन-काय पूर्वक क्षमा ग्रहण कराके और संघ को हितरूप शिक्षा देकर, यावज्जीव/जीवनपर्यंत समस्त संघ से वियोग के लिये तैयार हुए तथा संघ में से निकल एकाकी होकर परम आराधना को करने में उत्पन्न हुआ है परम हर्ष जिनके, ऐसे गुणों में परिपूर्ण हुए संघ से अकेले निकल जाते हैं ।
सदासुखदासजी