एवं च णिक्कमित्ता अंतो वाहिं च थंडिले जोगे ।
पुढवीसिलामए वा अप्पाणं णिज्जवे एक्को॥2042॥
संघ से जाकर गुफा आदि में प्रासुक अरु समतल भू पर ।
संस्तर या पाषाण शिला पर एकाकी ले निज आश्रय॥2042॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार संघ से बाहर निकलकर और गुफादिक के अन्दर या बाहर स्थंडिल अर्थात् चौडे, सम, उन्नत, जीव रहित योग्य स्थान में शुद्ध पृृथ्वी पर या शिलामय संस्तर पर स्वयं को एकाकी सहायता की इच्छा रहित स्थापित करते हैं ।

  सदासुखदासजी