पं-सदासुखदासजी
पव्वुत्ताणि तणाणि य जाचित्ता थंडिसम्मि पुव्वुत्ते ।
जदणाए संथरित्ता उत्तरसिरमधव पुव्वसिरं॥2043॥
यत्न पूर्वक प्रासुक तृण का संस्तर करता है भू पर ।
याचित तृण संस्तर पर पूरव अथवा उत्तर में हो शिर॥2043॥
सदासुखदासजी