पाचीणाभिमुहो वा उदीचिहुत्तो व तत्थ सो ठिच्चा ।
सीसे कदंजलिपुडो भावेण विसुद्धलेस्सेण॥2044॥
फिर पूरव या उत्तर में मुख करके संस्तर पर बैठे ।
भाव विशुद्धि पूर्वक अंजलि बना लगाये मस्तक से॥2044॥

  सदासुखदासजी