अरहादिअंतिगं तो किच्चा आलोचणं सुपरिसुद्धं ।
दंसणणाणचरित्तं परिसारेदूण णिस्सेसं॥2045॥
अर्हन्तादिक के सन्मुख निज दोषों का आलोचन कर ।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित को पूर्णरूप से निर्मल कर॥2045॥

  सदासुखदासजी