सव्वे विणिज्जिणंतो परीषहे विदिबलेण संजुत्तो ।
लेस्साए विसुज्झंतो धम्मं ज्झाणं उवणमित्ता॥2047॥
धैर्य और बल युक्त क्षपक सम्पूर्ण परीषह को जीते ।
शुभ लेश्याओं से विशुद्ध हो धर्म ध्यान में योजित हो॥2047॥

  सदासुखदासजी