ठिच्चा णिसिदित्ता वा तुवट्टिदूणव सकाय पडिचरणं ।
सयमेव णिरुवसग्गे कुणदि विहारम्मि सो भयवं॥2048॥
कायोत्सर्ग तथा शयनासन में भी क्षपक करे धर्मध्यान ।
यदि उपसर्ग न हो तो खुद ही करता तन की परिचर्या॥2048॥
अन्वयार्थ : पूर्वोक्त तृण/घास की याचना करके और पूर्वोक्त स्थंडिल आदि स्थान में तृणों का यत्नाचार पूर्वक संस्तर बनाकर तथा उत्तर दिशा में सिर करके अथवा पूर्व दिशा में शिर करके संस्तर करे/संस्तर बनाए (श्रावक घास लाकर क्षपक के शरीर प्रमाण स्थान में यत्नाचारपूर्वक बिछा देते हैं) । उस संस्तर में पूर्व दिशा के सन्मुख या उत्तर दिशा के सन्मुख तिष्ठ कर, विशुद्ध लेश्या रूप भाव करके, मस्तक पर अंजुली रखकर, अरहन्तादि के समीप उज्ज्वल आलोचना करके, दर्शन-ज्ञान-चारित्र को सभी प्रकार से उज्ज्वल करके, चार प्रकार के आहार का यावज्जीव त्याग करके, बाह्य-अभ्यंतर समस्त परिग्रह को छोडकर, समस्त परीषहों को जीतकर, धैर्य के बल से संयुक्त लेश्या से उज्ज्वल होकर धर्मध्यान को प्राप्त होकर के और यदि उपसर्ग का प्रसंग न हो तो खडे रहकर या बैठकर या शयन करके या विहार में अपनी काय का स्वयं ही वे भगवान क्षपक उपचार करते हैं, दूसरों से वैयावृत्त्य नहीं कराते ।

  सदासुखदासजी