सयमेव अप्पणो सो करेदि आउंटणादि किरियाओ ।
उच्चारादीणि तधा सयमेव विकिंचिदे विधिणा॥2049॥
हाथ पैर का फैलाना संकोचन आदि स्वयं करता ।
प्रतिष्ठापना समिति पूर्वक मल मूत्रादि स्वयं तजता॥2049॥
अन्वयार्थ : वे क्षपक अपने हाथ-पैर आदि अंगों का पसारना, समेटना/मोडना, पलटना इत्यादि अपनी देह की क्रिया स्वयं ही करते हैं, दूसरों से कराने का कोई संबंध/विकल्प ही नहीं है तथा मल-मूत्र का मोचन यथाविधि से शुद्ध भूमि में स्वयं ही करते हैं ।

  सदासुखदासजी