
जाधे पुण उवसग्गे देवा माणुस्सिया व तेरिच्छा ।
ताधे णिप्पडियम्मो ते अधियासेदि विगदभओ॥2050॥
देव मनुज या तिर्यंचों के द्वारा यदि होवे उपसर्ग ।
निर्भय होकर सहन करे वह करे नहीं उनका उपकार॥2050॥
अन्वयार्थ : जिस समय देवों कृत या मनुष्यों कृत या तिर्यंचों कृत उपसर्ग आ जाये तो जिस काल में भयरहित होकर उन उपसर्गों पर विजय प्राप्त करें - उपसर्ग में समभाव को नहीं छोडते - कायरता नहीं लाते ।
सदासुखदासजी