
इढिढमढुलु वि उव्विय किण्ण्रकिंपुरिसदेवकण्णाओ ।
लोलंति जदिवियतगं तधवि ण सो विम्भयं जाई॥2053॥
अतुल ऋद्धि से करें विक्रिया किन्नर आदिक सुर कन्या ।
उसे लुभायें तो भी क्षपक नहीं उन पर मोहित होता॥2053॥
अन्वयार्थ : यदि कदाचित् किन्नर, किंपुरुष, देवकन्या मिल करके असदृश ऋद्धि द्वारा विक्रिया करके अनेक प्रकार से हाव-भाव-विलास-विभ्रम, रूप-लावण्य, प्रीति-प्रेम से ललचावें तो भी वे क्षपक विस्मय को प्राप्त नहीं होते ।
सदासुखदासजी