सव्वो पोग्गलकाओ दुक्खत्ताए जदि तमुवणमेज्ज ।
तध विहु तस्स ण जायदि ज्झाणस्स विसोत्तिया को वि॥2054॥
तीन लोक के सारे पुद्गल-द्रव्य परिणमें यदि दुःखरूप ।
दुःखी करें उस धीर क्षपक को तो भी ध्यान न विचलित हो॥2054॥
अन्वयार्थ : जगत के समस्त पुद्गलों की जाति दु:खरूप होकर उनका तिरस्कार करें तो भी क्षपक के किंचित् भी ध्यान में विपरीतपना/विचलितपना नहीं हो सकता ।

  सदासुखदासजी