
सच्चित्ते साहरिदो तत्थोवेक्खादि बियत्तसव्वंगो ।
उवसग्गे य पसंते जदणाए थण्डिलमुवेदि॥2056॥
कोई क्षपक को हरित भूमि पर डाले तो तज तन-एकत्व ।
करे नहीं प्रतिकार और फिर स्वयं जाए प्रासुक भू पर॥2056॥
अन्वयार्थ : यदि व्याघ्र-सिंह, दुष्ट मनुष्यादि क्षपक को उठाकर सचित्त भूमि में पटक दें तो सम्पूर्ण अंगों से ममता छोडकर उदासीन होकर जिस भूमि में ले जायें, वहाँ ही तिष्ठें/रहते हैं और उपसर्ग टल जाये तो यत्नाचार पूर्वक सचित्त भूमि को छोडकर सुन्दर निर्जंतु, निर्दोष भूमि पर आ जाते हैं; उपसर्ग दूर होने के बाद कर्दम, हरित भूमि आदि सचित्त भूमि पर नहीं रहते ।
सदासुखदासजी