एवं उव सग्गविधिं परीसहविधिं च सोधिया संतो ।
मणवयणकायगुत्तो सुणिच्छिदो णिज्जिदकसाओ॥2057॥
इसप्रकार उपसर्ग-परीषह सहते हुए क्षपक मुनिराज ।
मन-वच-काय गुप्ति पालनकर जीते सर्व कषाय समाज॥2057॥

  सदासुखदासजी