इहलोए परलोए जीविदमरणे सुहे य दुक्खे य ।
णिप्पडिबद्धो विहरदि जिददुक्खपरिस्समो धिदिभं॥2058॥
इस भव अरु पर-भव में एवं जीवन-मृत्यु सुख-दुःख में ।
धीर-वीर वह दुःख-श्रम विजयी राग-द्वेष से दूर रहें॥2058॥
अन्वयार्थ : ऐसे उपसर्ग और परीषहों को सदा सहन करने में उद्यत रहते हैं, मन-वचनकाय - इन तीन गुप्तियों से युक्त, सत्यार्थ का निश्चय करने वाले, कषायों को जीतते हैं, दु:ख के, परिश्रम के ज्ञाता, धैर्यवान ऐसे क्षपक हैं, वे इस लोक के पदार्थ में और परलोक में तथा जीवन-मरण में, सुख-दु:ख में कहीं भी अपने परिणामों को नहीं बाँधते/बिगाडते, राग-द्वेष रहित स्वयं अलिप्त रहते हैं ।

  सदासुखदासजी