वायणपरियट्टणपुच्छणाओ मोत्तूण तधय धम्मथुदिं ।
सुत्तच्छपोरिसीसु वि सरेदि सुत्तत्थमेयमणो॥2059॥
वाचन पृच्छन आम्नाय एवं धर्माेपदेश तजकर ।
स्वाध्याय का काल न हो पर अनुप्रेक्षा में लीन रहे॥2059॥
अन्वयार्थ : ऐसे अवसर में वाचना, परिवर्तन, पृच्छना तथा धर्मस्तुति को त्याग कर धर्मोपदेश रूप सूत्र का और अर्थ का चिंतवन करते हैं । मरण नजदीक आने पर वाचना, पृच्छना, परिवर्तन का अवसर नहीं है । एक धर्मरूप उपदेश का ही स्मरण करते हैं ।

  सदासुखदासजी