सहसा चुक्करकलिदे णिसीधियादीसु मिच्छकारे सो ।
आसिअणिसीधियाओ णिग्गमणपवेसणं कुणइ॥2063॥
कोई भूल हो जाए तो ‘यह गलत हुआ, यह मिथ्या हो’ ।
बाहर जाते भीतर आते अस्सही अरु निःसही कहें॥2063॥
अन्वयार्थ : इंगिनीनामक मरण के धारक शीघ्रता से यदि स्खलित हो जायें, गिर जायें तो "मैं मिथ्या करता हूँ" - इस प्रकार मिथ्याकार करें और स्थान, वसतिका, गुफा - इनमें से निकलते समय आशिका/आशीर्वाद देकर जायें और प्रवेश करते समय निषेधिका करें कि "हे इस स्थान के स्वामी! आपकी इच्छा से मैं यहाँ स्थित रहना चाहता हूँ ।"साधु के समाचार में मिथ्याकार, आशिका और निषेधिका जो कही गई है, वे समस्त क्रियायें करें ।

  सदासुखदासजी