
पादे कंटयमादिं अच्छिम्मि रजादियं जदावेज्ज ।
गच्छदि अधाविधिं सो परणीहरणे य तुसिणीओ॥2064॥
काँटा लगे पैर में अथवा धूल जाए यदि आँखों में ।
मौन रहें खुद नहीं हटायें कोई हटाए तो मौन रहें॥2064॥
अन्वयार्थ : चरणों में कंटकादि लग जायें तथा नेत्रों में रज-तृणादि चले जायें तो आप जैसे के तैसे रहें, स्वयं नहीं निकालते । अन्य कोई कंटकादि निकाल दें तो स्वयं मौन रहें, कुछ नहीं कहते ।
सदासुखदासजी