वेउव्वणमाहारयचारणखीरासवादि लद्धीसु ।
तवसा उप्पण्णासु वि विरागभावेण सेवदि सो॥2065॥
उन्हें विक्रिया आहारक क्षीरास्रव चारण ऋद्धि हों ।
तप प्रभाव से, तो विरक्त वे उनका सेवन नहीं करें॥2065॥
अन्वयार्थ : वैक्रियक ऋद्धि, आहारक ऋद्धि, चारण ऋद्धि, क्षीरस्रावी - इत्यादि ऋद्धियाँ तप के प्रभाव से उत्पन्न होने पर भी, वे वीतरागभाव के धारक ऋद्धियों का सेवन नहीं करते ।

  सदासुखदासजी