
मोणाभिग्गहणिरदो रोगादंकादि वेदणाहेदुं ।
ण कुणदि पडिकारं सो तहेव तण्हाछुहादीणं॥2066॥
रोगादिक से हुई वेदना का न कभी प्रतिकार करें ।
मौन रहें अरु क्षुधा-तृषादिक का न कभी प्रतिकार करें॥2066॥
अन्वयार्थ : मौनव्रत के धारक साधु रोग की वेदना मेटने के लिये तथा तृषा-क्षुधादि को मेटने के लिये प्रतीकार - इलाज नहीं करते हैं ।
सदासुखदासजी