एवमधक्खादविधिं साधित्ता इंगिणी धुदकिलेसा ।
सिज्झंति केई केई हवंति देवा विमाणेसु॥2068॥
इस प्रकार उपर्युक्त विधि से इंगनिमरण साधना से ।
कोई क्लेश से रहित मुक्त हों कोई सुर-वैमानिक हों॥2068॥
अन्वयार्थ : कोई मुनिराज तो ऐसे होते हैं कि इंगिनीमरण को साधकर यथाख्यातचारित्र पूर्वक समस्त क्लेशों को उडाकर सिद्ध हो गये और कोई मुनि कल्पवासी विमानों में देव तथा अहमिंद्र होते हैं ।

  सदासुखदासजी