
णवरिं तणसंथारो पाओवगदस्स होदि पडिसिद्धो ।
आदपरपओगेण य पडिसिद्धिं सव्वपरियम्मं॥2071॥
प्रायोपगमन संन्यास विधि में तृण संस्तर का किया निषेध ।
क्योंकि स्वयं या अन्य साधु से प्रतिकारों का किया निषेध॥2071॥
अन्वयार्थ : प्रायोपगमन में तृणमय संस्तर भी नहीं और अपना सम्पूर्ण प्रतीकार/वैयावृत्त्य आदि अपने आप भी नहीं करते, अन्य से भी नहीं कराते ।
सदासुखदासजी