
सो सल्लहिददेहो जम्हा पाओवगमणमुवजादि ।
उच्चारादिविकिंचणमवि णत्थि पवोगदो तम्हा॥2072॥
जो अपने तन को कृश करता वही करे प्रायोपगमन ।
कफ मल मूत्रादिक का त्याग करे न स्वयं या अन्यों से॥2072॥
अन्वयार्थ : सम्यक्पने से कृश किया है शरीर को जिसने - ऐसे साधु प्रायोपगमन संन्यास को प्राप्त होते हैं, इसलिए अपने प्रयोगतें/उस कारण इसमें मल-मूत्र आदि निवारण करना नहीं होता, ।
सदासुखदासजी