
वोसट्टचत्तदेहो दु णिक्खिवेज्जो जहिं जधा अंगं ।
जावज्जीवं तु सयं तहिं तमंगं ण चालेज्ज॥2075॥
तन-ममत्व त्यागी प्रायोपगमनधारी के तन का अंग ।
आजीवन वैसा ही रहने देते नहीं हिलाते अंग॥2075॥
अन्वयार्थ : छोडा है देह जिनने, ऐसे प्रायोपगमन के धारी जिस क्षेत्र में जैसे अंग पडे हों, वैसे ही यावज्जीव पडे रहने देते हैं; स्वयं अपने अंगों को हिलाते-चलाते नहीं हैं । जैसे कोई सूखा काष्ठ/लकडी या मृतक का शरीर पडा हो, तैसे अचल रहते हैं ।
सदासुखदासजी