एवं णिप्पडियम्मं भणंति पाओवगमणमणमरहंता ।
णिमया अणिहारं तं सिया य णीहारमुवसग्गे॥2076॥
इसप्रकार प्रतिकार रहित प्रायोपगमन कहते जिनराज ।
निश्चय से यह अचल कहा उपसगाब में होता चलवान॥2076॥
अन्वयार्थ : ऐसे स्व-पर कृत प्रतीकार रहित प्रायोपगमन संन्यास को, अरहन्त भगवान ने कहा है, वह शरीर नियम से उपसर्ग बिना तो अनाहार/अचल है और उपसर्ग अवस्था में मनुष्य, तिर्यंच, देवादि चलायमान करते हैं,तब चल (उनके द्वारा हिलाया-चलाया जाता) होते हैं ।

  सदासुखदासजी