
उवसग्गेण य साहरिदो सो अण्णत्थ कुणदि जं कालं ।
तम्हा वुत्तं णीहारमदो अण्णं अणीहारं॥2077॥
एक क्षेत्र से अन्य क्षेत्र में डालें यदि उपसगाब में ।
तो नीहार मरण कहते अन्यथा उसे अनिहार कहें॥2077॥
अन्वयार्थ : उपसर्ग में हरण किये गये वे साधु अन्य क्षेत्र में काल/मरण करते हैं, इसलिए इसे नीहार कहते हैं । अत: अन्य प्रकार से उपसर्ग रहित अवस्था में चलायमान नहीं होते, इसलिए अनाहार हैं ।
सदासुखदासजी