
जन्मौच्चैः कुल एव सम्पदधिके, लावण्यवारां निधि-;
र्नीरोगं वपुरायुरा-दिसकलं, धर्माद्-ध्रुवं जायते ।
सा न श्रीरथवा जगत्सु न सुखं, तत्ते न शुभ्रा गुणा;
यैरुत्कण्ठित-मानसैरिव नरो, नाऽश्रीयते धार्मिक: ॥184॥
उत्तम कुल, लावण्यमयी-तन-रोगरहित सम्पदा विपुल ।
मात्र धर्म से मिलती दीर्घायु आदि वस्तुएँ सकल ॥
जग में ऐसी नहीं लक्ष्मी, उत्तम सुख या गुण निर्मल ।
जिसका धर्मात्मा से उत्कण्ठित मन से नहिं होय मिलन ॥
अन्वयार्थ : सम्पदा की अधिकता, उत्तम कुल में जन्म, लावण्यमयी व नीरोग शरीर तथा आयु आदि समस्त बातें, निश्चय से धर्म के प्रताप से ही मिलती हैं । संसार में ऐसी कोई लक्ष्मी नहीं है, जो एकदम आकर धर्मात्मा पुरुष का आश्रय न लें । उत्तम सुख और निर्मल गुण भी संसार के भीतर ऐसे कोई नहीं है, जो धर्मात्मा पुरुष का स्वयमेव आकर आश्रय न करें ।