+ दानोपदेश में नदी का उदाहरण -
मूले तनुस्तदनु धावति वर्धमाना,
यावच्छिवं सरिदिवानिशमासमुद्रम् ।
लक्ष्मीः सदृष्टिपुरुषस्य यतीन्द्रदान-,
पुण्यात्पुरः सह यशोभिरतीद्धफेनैः॥14॥
नदी मूल में कम चौड़ी हो, किन्तु बाद में होय विशाल ।
पहले हो थोड़ी लक्ष्मी पश्चात् यश सहित हो विस्तार॥
अन्वयार्थ : जिस पहाड़ से नदी निकलती है, वहाँ पर यद्यपि नदी का फैलाव थोड़ा होता है, परन्तु समुद्र पर्यन्त जिस प्रकार फेन सहित वह नदी, उत्तरोत्तर बढ़ती ही चली जाती है; उसी प्रकार यद्यपि सम्यग्दृष्टि के पहले लक्ष्मी थोड़ी होती है, परन्तु मुनीश्वरों को दिए हुए दान के प्रभाव से कीर्ति के साथ मोक्षपर्यन्त वह इन्द्र-अहमिन्द्र-चक्रवर्ती-तीर्थंकरादि के रूप में दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही चली जाती है । इसलिए सम्यग्दृष्टि को अवश्य दान देना चाहिए ।